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पांच दिन के पर्व में लोक मान्यताओं-परंपराओं की अभिव्यक्ति

दीपावली की अगवानी में आसोज माह की अमावस से ही घरों की सफाई लिपाई पुताई के काम में महिलाएं जुट जाती हैं। हर गृहणि अपने घर को अधिक सुंदर बनाने के प्रयास में जुट जाती है। परिवार के अन्य सदस्य भी इसमें सहयोग करते हैं रंग रोगन और घरों की सजावट का कार्य धनतेरस तक निपटा लिया जाता हे। महिलाएं ऐसे ऐसे चित्रांकन अपने घर आंगन में बनाती हैं जो देखते ही बनते हैं। जिन्हें हाड़ौती में ”मांडने“ कहा जाता हैं मांडना संस्कृति में हमारी कला व जीवन शैली के जीवंत दर्शन होते हैं। महिलाओं द्वारा बनाए जाने वाले मांडनों में बीजणी, बावड़ी, हीड़ा,गौखुर,सात्या,छपूला,बावड़ी,फूल पती से सजे गमले,गूजरी,शेर भीत पर मंडी नृत्य करती मोरड़ी,दोहे चैपाईयां तो कहीं बतीसा जिसका 32 अंकों का अनूठा रहस्य प्रमुख होता हैं।  महिलाएं साज सजावट से निपट मिठाईयां बनाने में जुट जाती हैं ।पशुधन के लिए कंडे,डोर मोरपंखों से सुंदर कंडे बनाए जाते हैं। अब तो लोगों ने इसे गृह उद्योग बना लिया हैं लेकिन पशुधन घटा तो इनकी बिक्री पर भी असर पड़ा है।वहीं प्लास्टिक के प्रवेश ने परंपरागत धंधे को चैपट कर दिया हें  जलताई- यू ंतो आमतौर पर ...

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