रुठते जा रहे हैं बरस्ये पाहुन....



           यो बरस्यो फांवणो आयो है काकीजी।भुवाजी, यो बरस्यो फावणो आयो है। दीपावली की संध्या पर सुहागिन गृहणि (प्रायःनववधु) गोटा किनारी लगी साड़ी और लहंगे चोली में चमचमाती, झांझर झनकाती, हाथों की नई चूडि़यां खनकाती दीप्त दीपकों से भरी थाली लिए पड़ौस के घर घर जाकर सलज्ज मधुर स्वर में ऐसी सूचना के साथ द्वार के पास एक दीपक रखती है। और आगे बढ़ जाती हैं

      कार्तिक अमावस्या का तमस उसी दिन आलोक के समक्ष अपनी पराजय स्वीकार करके जन जन के मन की निःशब्द वाणी बोलता है। तमसो मां ज्योतिर्गमय। घर के लिपे पुते प्रियदर्शन आंगन में चित्रित मांडने के बीच स्वच्छ थाली में दीपक सजाकर जलाए जाते हैं। कुंकुम अक्षत दूर्वादल से बने विभिन्न मिष्ठान्न का नैवैद्य अर्पित किया जाता है। फिर गृहस्वामिनी आंचल पसारकर अपने भवन और पारिवारिक जीवन में आलोक का वरदान मांगती है।

       नववधुएं भी दीप ज्योति के सम्मुख नत होकर म नही मन अपने सुहाग की दीर्घायु और गोद हरी भरी होने की कामना करती है। तदन्तर दीपदान का अनुष्ठान आरंभ होता है। पहले तुलसी स्थानक पर, पानी की परेंडी पर -वरुण देव को चूल्हे पर अग्नि देवता को, पूजा स्थल पर अपने उपास्य को फिर आलयों में यत्र तत्र दीपक धर दिए जाते हैं।घर आंगन जगर मगर कर उठता है। अमावस के निबिड़ अंधकार में ही जगमग प्रकाश का वास्तविक मूल्यांकन हो पाता है। एक ओर आनन ओप उजास और इधर उधर बलखाती ज्योति का प्रकाश, दोनों ही आमने सामने हो जाते हैं। तब घर की स्वामिनी अपनी बहू या बेटी को दीप दान के लिए भेजती है। गृहणि पड़ौस के प्रत्येक दरवाजे पर यथायोग्य सम्मान सूचक सम्बोधन से उक्त सूचना देकर एक दीपक धर देती है। तब उतर में उस घर की गृहणि आश्वासन देती है- आबादो लाडी,घी शक्कर परोसूंगी। यदि उतरदायी बाहर आ जाए तो दीपदात्री थाली चबूतरे पर रखकर उसके पांव दबाती है। उसको फिर आशीर्वाद मिलता है। सेली सपूती होजो बेटा जण जो, सुख देखजो बूढ़ सुहागण होजो।


      हाड़ौती और उससे मिले मध्यप्रदेश के सूदूर मालवाअंचल में आज भी यह परम्परा मिलती है जिसे आधुनिकता की आपा धापी धीरे धीरे लीलती जा रही है आज जिस समाजवाद का थोथा कर्णकटुघोष यत्र तत्र सुनाई देता है उसका शुद्ध सहज और सुगम सम्भव स्वरूप हमारें पूर्वजो न जाने कितने वर्ष पहले ही प्रस्तुत करके उसे ज्योतिपर्व का पुनीत नाम प्रदान कर दिया था। जहां कही भी अंधकार दीखता हो वहां अपने आलोक का अंश स्वंय अर्पित कर आओ। प्रकाश को बाटो

      आज जमाना बदल रहा है भगवानो के दर्शन नेट पर होने लगे है बरस्ये पाहुने जो वर्ष में एक बार आते है  अब धीरे धीरे रूठते जा रहे है। जहां सब्जी छोकने के लिए 50 ग्राम तेंल के लिए भी 5 रू खर्च होते हो वहां 20-25 मृतिका प्यालियों में तेल भरना सहज संभव नही है। दूसरी और आज कल बिजली के रंग बिरंगे बल्बों की लडियो से भवन को आलोकित करने का चलन हो गया है। अब तो बस कही कही ही कोई परम्परावादी प्रोढाए दो चार दीपक इधर उधर रखकर इस पर्व के समाप्त होते महत्व को प्राणवायु देकर जीवित रख रही ह ैअब ना पायल की झनकार सुनाई देती ह ैना बरस्ये पाहुने के आगमन का स्वर। रूठते ही जा रहे है ये वार्षिक अतिथि .........................................
         
हेमराज गुप्ता निडर मांगरोल

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