कोटा साड़ी के निर्माण में मांगरोल के कारीगरों की अहम भूमिका

बरसों से काम कर रहे हुनरमंदों को नहीं मिली पहचान
हाथ करघों पर निर्भर हेै जिंदगाणी...

बारां जिले के प्रमुख नगरों में से एक मांगरोल की पहचान पावरलूमों पर बरसों से बनते आ रहे खादी कपड़़े के रुप में तो है ही सही लेकिन कोटा डोरिया की साड़़ी के रुप में भी अब यहां के कारीगर अपने हुनर से एक एक घागे को ताने बाने के माध्यम से साड़ियों की ऐसी व उम्दा डिजाईनें तैयार करने में महारत हासिल कर चुके हैं। जिनका कोई सानी नहीं। छोटे स्तर पर यहां होने वाले काम की पहचान देश के नामी गिरामी शहरों में लगने वाली टेक्सटाईल प्रदर्शनियों तक जा पहुंची हैं। 


प्रधानमंत्री से सम्मानित हुए मांगरोल के यासीन भाई

हजार से लाख तक की बनती हैं साड़ियां- यहां बनने वाली कोटा साड़़ी के कारीगर एक हजार रु. से एक लाख कीमत तक केी साड़ियां बनाते हैं। साड़ी की डिजाइ्रन व उनमें लगने वाली सोने की जरी से इनका मुल्य बढ़ता जाता हैं। इन साड़ियों को हैदराबाद,कोलकाता,अहमदाबाद,चैन्नई दिल्ली व जयपुर में लगने वाली राष्ट्रीय स्तर की प्रदर्शनियों व फैशन मेलों में यहां से भेजा जाता है। एक हजार की साड़ी में 500 रु. की मजदूरी तय होती है। वहां 500 रु. का कच्चा माल लगता हैं जैसे जैसे इसमें डिजाईन व सोने की जरी का समावेश होता जाता है। कीमत बढ़ती जाती हैं ज्यादा महंगी साड़ी हो या सस्ती प्रतिदिन की मजदूरी डेढ़ सौ रु. से ज्यादा नहीं बैठती हैं इसी से यहां के बुनकर परिवार का खर्च चलाते हैं। 

राष्ट्रीय प्रदर्शनी में सम्मान- यहां के यासीन भाई को 2014 में चैन्नई में आयोजित नेशनल अवार्ड कार्य्रक्रम में इंडियन हैंडलूम ब्रांड आफ प्रोडक्ट का पुरस्कार देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के हाथों दिया गया। वहां इनको साड़ी के मार्का के रुप में अधिकृत कर मान्यता का प्रमाणपत्र व ताम्रपत्र से भी नवाजा गया। तब से यहां के इस हुनर का नाम देश के पटल पर आ गया। और अब एक से एक नयी वैरायटी राजस्थान हैरिटेज वीक व अन्य बड़े शहरों की प्रदर्शनियों  में आने वालों का मन मोह लेती हैं। 
हाथ करघा पर काम कर रही बुनकर

डिजाईन से मोलभाव- यहां कच्चा माल सूरत व बैंगलोर से आता है। यासीन भाई यहां चलने वाले 70-80 बुनकरों को कच्चा माल मुहैया कराते हैं। और बुनकर को मजदूरी मिल जाती है। बूटी के हिसाब से एक खत (चैक) के 3 रु. मिलते हैं। जितनी बूटियां उतना पैसा साधारण बूटी वाली साड़़ी तीन हजार तक में बिक जाती है। 

जगह की तंगी- बरसों से यहां कोटा साड़ी बना रहे मजदूर तंग हाल घरों में ही यह काम करते हैं। इन्हें आत तलक सरकारी मदद नहीं मिली वहां लाईटें न आने से भी काम प्रभावित होता है। इससे समय ज्यादा लगता है। तो मजदूरी का टोटा पड़ जाता है। फिर भी यहां सुविधाओं के अभाव के बाद भी प्रतिमाह 500 साड़ियां तैयार हो जाती हैं।  

ऐसी बनती हैं साड़ियां
कोटा व चंदेरी की भी बनती हैं साड़ियां- असली कोटा साड़ी जो हाथ करघे पर तैयार होती है। केवल मांगरोल व कैथून में ही बनती हैं मजदूर साड़ी तैयार कर बड़े शहरों के सेठ को संभलाते हैं। तब यह कोटा व चंदेरी के बाजार में पहुंचती हैं। कई दिनों में तैयार होने वाली साड़ी तैयार होने व मजदूरी महंगी होने के कारण कोटा साड़ी भी नकली बाजार में बिक रही है। उतरप्रदेश की साड़ियां कोटा साड़ी के नाम से बाजार में सस्ती पड़ती हैं। उन्हें कोटा साड़ी के नाम से बेचा जाता है। मजदूरों के पास राशि का अभाव व सरकारी मदद के अभाव में यह कारोबार भी बिचैलियों का शिकार हो रहा हैं ।  

मौहम्मद सिद्यीक, जुलेखा बेगम, मौहम्मद रफीक

हाथ करघा पर तीन चार साल से काम कर रही जुलेखा बेगम का कहना था कि कच्चा माल लेकर हाथ करघे पर साड़़ी बनाने का काम पुश्तैनी हैं मजदूरी के अलावा कहां साड़ियां बिकने जाती है। इससे हमारा कोई लेना देना नहीं हैं। जुलेखा एक हजार से एक लाख की साड़ी बनाने में सिद्वहस्त हैं। हालांकि पढ़ाई तो उसने 8वीं तक की हैं लेकिन उम्दा किस्म की साड़ियां बनाकर वह किसी डिजाइ्रनर से कम नहीं लगती । 
बुनकर मौहम्मद रफीक का कहना था कि एक साड़ी तीन रोज से लेकर तीस दिन में बनाते हैं। रोज की मजदूरी काम पर निर्भर हैं लेकिन डेढ़ सौ रु आठ घंटे काम करने के बाद मिल पाते हें ।  

मौहम्मद सिददीक का कहना था कि लाइ्रटें न आने से चकाचैंध आती है व काम प्रभावित होता हे। सरकार हस्तकला को प्रोत्साहन देती हे। लेकिन बिजली व पावरलूम रहित यहां के हाथकरघा उद्योग का काम करने वालों को आज तक प्रोत्साहन नहीं मिल सका हैं उसका कहना था कि इस साड़़ी को पावरलूम पर बनाने पर सरकार की रोक है। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इस पर 50 हजार तक का जुर्माना कर रक्खा है। इसके बावजूद हाथकरघा पर कामगारों को सरकारी संरक्षण नहीं मिल पा रहा हें ।





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