इंद्रदेव की बेरुखी लील गई किसानों की दीपावली की खुशियां.....

दीपावली विशेष
 हेमराज गुप्ता निडर
     

      पिछले चार बरस से खेती-किसानी प्रधान इस इलाके में पर्याप्त नहरी पानी छोड़ने के बाद भी जर्जर नहरी तंत्र लगातार धोखा देता आ रहा है। चंबल की दायीं मुख्य नहर से पर्याप्त पानी छोड़ने के बाद भी किसानों के खेत हरे नहीं हुए,वहां टैल क्षैत्र तो पानी की बाट ही जोहता रहता है। नहरों के जर्जर हालातों ने नदी किनारे प्यासा गांव वाली कहावत चरितार्थ कर रक्खी है। इंद्रदेव की मेहरबानी पर निर्भर एक फसल के लगातार चार बरस से धोखा देने से किसानों की हालत पतली हो गई्र। कभी इ्रद्रदेव ऐसे मेहरबान हुए कि खेत से दाना ही बाहर नहीं आया, तो कभी आखरी दिनों में बरसात ने दगा दिया, तो फलाव ही नहीं आया। ऐसे इस बार भी किसानों के घर दिवाली का त्यौहार तो जैसे तैसे मनाने की तैयारी चल रही है। लेकिन दिए में तेल कम होने अर्थात किसान की जेब तंग होने से प्रकाश की लौ का उजियारा दीपक जलाने के बाद भी किसानों के हालातों की कहानी बयां करता नजर आ रहा है। 

           इस साल आखातीज पर व उससे पहले व बाद में भी गांवों में शादी ब्याह नहीं हो सके किसानों ने माली हालत कमजोर होने से शादी ब्याह भी अगले बरस के लिए टाल दिए, सिंचित क्षैत्र से सरसब्ज इस क्षैत्र के किसानों की खेती के हालात यह रहे कि इन चार सालों में कोई खेत में मण दो मण गल्ला हाथ लगा तो कोई खेत में बोया बीज भी पल्ले नहीं पड़ा। तो किसी ने फसल काटे बिना ही जानवरों के चरने के लिए छांेड़ दी,इस चौथे साल में हालात और भी तगड़े रहे जहां सोयाबीन लहलहानी चाहिए थी वहां छप्पर फाड़ बरसे बदरा से खेत तालाब बन गए। लगातार बरसात ने ऐसा कहर ढ़ाया कि जैसे तैसे बीज बजौले का जुगाड़ कर बुवाई करने वाला किसान हाहाकार कर उठा।
 

              खेती के बदले हालातों से किसान बैंको का क्रेडिट कार्ड का पैसा भी चुकता नहीं कर पाए,ऐसे में बैंकों का एन.पी.ए. बढ़ गया। सहकारी बैंकों से बिना ब्याज नकद साख ऋण लेने के लिए किसानों को आंदोलन करना पड़ा। फिर भी कई किसान अछूते रह गए। सरकार के प्रति नाराजगी भी इस बरस किसानों में खूब दिखाई दी। पिछले बरस नष्ट हुई फसलों का मुआवजा एक साल बाद दिया,तो दो हैक्टेयर से ज्यादा के किसान वंचित कर दिए गए। सरकार ने एक बरस बाद तिजोरी का ताला खोल मुआवजा भी बांटा और किसानों की बेरुखी का कोपभाजन भी होना पड़ा। खाद,बीज,पेट्रोल डीजल के लगातार बढ़ रहे दामों से हंकाई जुताई महंगी हो गई। खेती का खर्चा बढ़ा तो मानो किसान की बोलती ही बंद हो गई। आज भी साल के सबसे बड़े त्यौहार दीपावली पर जब किसान अपनी  करत -कमाई का लेखा जोखा करने लगता हैं तो उसकी आंखों से टप-टप आंसू गिर पड़ते हैं। किसी पर पहले के शादी ब्याह का कर्जा है तो किसी को अपने टाबर के हाथ पीले करने की चिंता। इस सबके बीच करसाण की दीपावली फीकी फीकी नजर आ रही है।...
 

 

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